नेपाल में फेस्टिभल जिसको हम जात्रा कहते हैं, कि कमी नहीं है । हम लोग जीवित देवीका भी पूजा करते हैं अौर पिशाचों की भी । जीवित देवी कि कुमारी जात्रा यहाँ काठमाण्डू में हरेक वर्ष आयोजन होता है । उसी तरह खराब आत्मा असल आत्माका बिगार नकरें उस खातिर हरेक वर्ष हम पिशाच चतुर्दशीके दिन पिशाचों की भी पूजा करते हैं । इस बारेमें मैं आपको अधिक जानकारी उसी दिन देने के कोसिस करता हुँ । बहरहाल इस चिट्ठे में मैं हाल ही हुए एक अनूठे जात्रा के बारे में बताने जा रहा हुँ । खुद नेपाल के लोगोंको भी इस जात्रा के बारे में कम ही जानकारी है ।
यहाँ एक स्थान है टिस्टुंग । वहाँ पर एक मन्दिर है बज्रवाराही । जाहिर है यह हिन्दू मन्दिर है अौर वाराहीका सम्बन्ध भगवती से है । इस मन्दिर में पहले तो मानव बली ही दी जाती थी । लेकिन आज की दौर में मानव बली उचित नहीं होती है । इसलिए मानव बलीका प्रचलन लोप हो गया । परन्तु मानव बलीकी प्रतिक के रुप में आजकल वहाँ मानव अंगूठे काटकर देवीको भोग देनेकी प्रचलन है । इस वर्ष मन्दिर के पूजारी ने स्वयं अपना अंगूठा काटकर भोग दिया था ।
अंगूठा ही नहीं, वहाँ हजारौं पशुपंक्षीयों का भी बलि दिया गया था । कभी कभी मै सोचता हुँ नेपाल में इतनी बलि क्योँ दिया जाता है ? हिंसा हमारी संस्कृति में क्यों इस तरह फैला हुआ है ? हरेक वर्ष विजयादशमी के दो दिन पहले भी नेपाल भर के हिन्दू बली दिया करते है । उस रोज भी हजारौं पंक्षीका हत्या होता है । एक बार मेरे एक सात समुद्रपार के दोस्त नें मुझसे पूछा था, तुम लोगों की धर्म एेसा है तो पाप कैसा होगा ? शायद इसी वजह से नेपाल आज हिंसा-प्रतिहिंसा में फँसा हुआ है ।
मैं तो शाकाहारी हुँ । लेकिन मेरे घर में सभी मांसाहारी है । नेपाल में कोइ अपने आपको शाकाहारी कहे तो उसे अनूठे ढंग से देखा जाता है । आप लोगको सुनकर आश्चर्य होगा कि यहीं काठमाण्डू के पास ही गणेश वा गणपतिकी एक मन्दिर में भी बली दिया जाता है । वैसे तो बाँकी गणेशकी मन्दिरों में लड्डु ही चढाया जाता है, लेकिन इस मन्दिर में क्यों एेसा होता है ? इस मन्दिर के बारे में भी विस्तार में आपको किसी दिन बताने की कोशिश करेंगें ।
तो बात हो रही थी बज्रबाराही मन्दिर में बलियों की । बलि के अलावा वहाँ पशुअों की आहुती भी दिया गया था । सर्प से लेकर भैंस तक की सिरको वहाँ की गई होम में आहुती दिया गया था ।