नेपालसे एक चिट्ठा

Tuesday, December 06, 2005

भारतीय नेता ने नेपाल मेँ आकर कहा- "राजाको समुद्रमेँ बहा दो"

इन दिनोँ नेपाल मेँ राजा के निरंकुश शासनके विरुध्द जनआन्दोलन चल रहा है। नेपाल के लोकतान्त्रिक आन्दोलनको विदेशसे ऐक्यवध्दताकी आवश्यकता तो है, मगर जब कोइ विदेशी नेता नेपाल के भूमि मे आकर कूटनीतिक मर्यादा के विपरीत कुछ बात कहते है, तो इसे क्या कहा जाए। चाहे वो राजतन्त्र के समर्थन मेँ हो या विपक्ष मेँ। डिसेम्बर २ मेँ कम्युनिस्ट पार्टी एमालेके आयोजन मेँ एक विशाल सभा हुई थी काठमाण्डू मे। उसी सभा मेँ भारतके पश्चिम बंगालका पूर्व कृषिमन्त्री विप्लव ने कहा- गली गली मेँ शोर है, राजा ज्ञानेन्द्र चोर है। राजाको जब हटाइएगा तो उसे आप मेरे पास भेज दिजिएगा, हम उसे समुद्र मेँ फेंक देँगेँ। देखिए मैने उनका यह कथन भिडियो ब्लग के रुपमे यहाँ रखा है। यहाँ क्लिक किजिए।
आप लोग क्या कहते है ? कोई नेपाली नेता आपके यहाँ आकर राष्ट्रपति के विरुध्द मेँ वा प्रधानमन्त्री के विरुध्द मेँ अनापसनाप बके तो उसे आप किस तरिके से लेँगे ?

नेपाल के जनआन्दोलन के विषय मेँ यह भिडियो ब्लग भी देख लिजिए।
http://video.google.com/videoplay?docid=-8008922312335507894&q=UML

6 Comments:

At 11:42 AM, Blogger अनुनाद सिंह said...

नेपाल के सम्बन्ध में भारत की नीति अपने ही पैर पर कुल्हाडी मारने जैसी है | इसमें अब कोई सन्देह नही रहा है !

 
At 11:55 AM, Blogger Jitendra Chaudhary said...

नेपाल की घटनाये, जनविद्रोह ये नेपाल का आंतरिक मामला है, किसी भी विदेशी नेता को कोई भी विवादास्पद बयान देने से पहले सौ बार सोच लेना चाहिये। नेपाल छोटा देश है, इसका मतलब ये नही है कि उसका कोई आत्मसम्मान नही है। कम्यूनिस्ट नेता के इस बयान की सर्वत्र निन्दा की जानी चाहिये।

 
At 5:12 PM, Blogger Pratik said...

नेपाल के सन्‍दर्भ में भारत सरकार की विदेश नीति का रवैया पूरी तरह ढुलमुल है। जहाँ एक ओर भारत नेपाल में पूर्ण लोकतन्‍त्र बहाली की मांग करता है, वहीं दूसरी ओर नेपाल के राजा का समर्थन भी करता है।

जहाँ एक तरफ़ वामपन्‍थी उसी सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं, जो नेपाल को शस्‍त्रों की आपूर्ति कर रही है। वहीं दूसरी ओर नेपाल में जाकर इस प्रकार के बयान दे रहे हैं। यह दोगलापन नहीं तो और क्‍या है?

 
At 2:02 AM, Blogger catcher said...

कम्युनिस्टों से तो भारतीय खुद भी परेशान हैं. इनकी हरकतों को देखकर बाकी भारतीय भी सिर पीट लेते है...........फ़िक्र इन्हे अपने भारत की नही है...........दशकों से ये बंगाल में बैठे हैं, गरीबों को इतने सालों से उनका हक़ दिला रहे है और कैसा मज़ाक है कि बंगाल ही आज सबसे गरीब राज्य है, 1950 के दशक के और आज के बंगाल की तुलना भी नहीं कर सकते. बार्बाद कर दिया........ अरे बेशर्मों, पहले अपने बंगाल की जनता को खुशहाल कर लो..........फ़िर बाकी भारत को करना फ़िर अगर, अगर जिंदगी इजाज़त दे तो पडोस में क्रांती के बारे में सोचना.......माफ़ करना दोस्त, सच में हमें तुम्हारे घरेलू मामलातों में दख्लंदाज़ी करने का कोई हक़ नहीं है......उन ज़ाहिलों की तरफ़ से मैं माफ़ी मांगता हूँ.

 
At 4:38 PM, Blogger हनवंतसिंघ राजपुरोहित said...

तुम सभी नेपाली लोग समझने कि कोशिश क्यूं नहि करते. लोकतंत्र आने पर भारत का क्या हाल है समझते हो. हम भारतीयों से ज्यादा कौन समझेगा.

नेपाल में राजतंत्र से नियंत्रित लोकतंत्र उत्तम और सबसे अच्छा है. कास भारत में भी एसा हो पाता.

बाद में पछताना पडे ऎसा काम मत करो. हिंदू राष्ट्र कि हिंदुत्वत तो खतम हो ही चुकि है. और बहुत कुछ खतम होग. धर्मांतरण होगा. हिंदु होना पाप समझा जायेगा.............. संभल जाओ दोस्त.

 
At 5:29 AM, Anonymous Anonymous said...

प्रिय शलोक्य जी,
आपके सभी पोस्ट पढ़ गई. अच्छा लगा कि आप इतनी विविधता के साथ काम कर रहे हैं. लेकिन आपने लंबे समय से अपने ब्लाग को अपडेट नहीं किया है. अगर आप इसे अपडेट करते रहें तो दूसरों की रुचि भी बनी रहेगी.
वंदना
www.raviwar.com
vandana.raviwar@gmail.com

 

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